रोम: गणराज्य से साम्राज्य तक का सफर

रोमन सीनेट का एक चित्र

जब कभी भी लोकतंत्र और गणराज्य की बहस छिड़ेगी, और विश्व के पहले गणराज्यो की गणना होगी, रोम गणराज्य का नाम उसमे सबसे पहले गणराज्यो में लिया जायगा | इसाह मसीह के जन्म से भी सदियों पहले की व्यवस्था जिस में आज के लोकतंत्र की झांकिया दिखती है, ऐसी ही एक व्यवस्था को अपने इतिहास के पन्नो में समेटे आज भी रोम कई लोकतंत्रो के लिए प्रेरणा और प्रबंधन को समझने का काम करती है!

आज भी रोम का इतिहास सत्ता के संघर्षो से होने वाली समस्याओ को बहुत बारीकी से समझाता है, विरोध में उठने वाले स्वतंत्र स्वरों को शक्ति प्रदान करता है और लोकतंत्र में व्यक्ति विशेष द्वारा किये जा रहे तानाशाही के परिणामो से रूबरू कराता है|

रोम गणराज्य की स्थापना तब हुई थी जब 509 ई.पू. में अंतिम इट्रस्केन राजा को उखाड़ फेंका गया था। रोम की अगली सरकार ने एक गणतंत्र के रूप में एक प्रतिनिधि लोकतंत्र के रूप में कार्य किया। प्रारंभ में, रोम के सबसे धनी परिवार, संरक्षक, सत्ता रखते थे जिन्हे सीनेट कहते थे और केवल वे ही राजनीतिक या धार्मिक कार्यालय रख सकते थे। बाकी सभी को सामान वर्ग (प्लेबीयन) माना जाता था, और इस समूह का कोई भी सदस्य पद पर नहीं रह सकता था। रोम में सामान्य वर्ग को अपना अधिकार प्राप्त करने में और एक व्यवस्थित गणराज्य की स्थापना करने में लगभग 200 वर्षों की बड़ी अवधि लगी | हालाँकि इसे वापस एक साम्राज्य बनने में महज कुछ साल लगे |

रोम के सामन वर्ग ने सरकार के भीतर संघर्ष किया और आखिरकार सत्ता के गलियारों में अपनी जगह हासिल की।

रोमन गणराज्य के केंद्र में सीनेट था। ऐसा माना जाता है कि एट्रसकेन राजाओं के शासन के दौरान भी सीनेट का अस्तित्व था, हालाँकि तब सीनेट का काम राजाओं को शहर और नागरिको के प्रबंधन को नियंत्रित करने वाले नियमों से संबंधित मामलों पर सलाह देना था। वहीं गणतंत्र में, सीनेट के सदस्य गणतंत्र के अन्य शासी निकाय के सलाहकार के रूप में कार्य करते थे और सदस्यों के कार्य का दायरा साम्राज्य के मुक़ाबले कहीं ज्यादा था। गणराज्य में सदस्यों को युद्ध और व्यापार में जुड़े निर्णय को स्वीकृति देने का अधिकार का | हालाँकि ये निर्णय सदस्यों में आपसी मतदान के बाद ही होता था!

यद्यपि सीनेट ने औपचारिक रूप से कानून नहीं बनाए, लेकिन इसके सदस्यों की प्रतिष्ठा ने सीनेट को रोम के कानून बनाने वाले निकायों पर बहुत प्रभाव दिया।

सीनेट केवल थोड़े समय के लिए गणतंत्र के लिए एकमात्र शासी निकाय के रूप में चली, जो गणतंत्र की स्थापना से 509 ई.पू. 494 ई.पू. तक, जब प्लेबियनो द्वारा की गई एक हड़ताल के परिणामस्वरूप कंसिलियम प्लीबिस, या प्लीब्स की परिषद की स्थापना हुई। इससे सरकार में लोगों को एक आवाज मिली। परिणामस्वरूप, रोमन गणराज्य के नए विधायी या कानून बनाने वाले निकाय बनाए गए। जिन्हे विधानसभा कहा जाता है, इन विधायी निकायों ने निम्नलिखित तरीके से शक्ति साझा की:

कमेटिया सेंचुरीयाता – युद्ध और शांति के बारे में निर्णय लिया; पारित कानून; निर्वाचित मजिस्ट्रेट (कॉन्सल, प्रेटोर, और सेंसर); मृत्युदंड की अपील की, विदेशी संबंधों का आयोजन किया।

कंसीलियम प्लीबिस – अपने स्वयं के अधिकारियों का चुनाव किया, सामन वर्ग द्वारा पालन के लिए तैयार किए गए फरमान; 287 ईसा पूर्व में, पूरे रोमन समुदाय के लिए सभी फरमानों को बाध्यकारी बनाने की शक्ति प्राप्त की।

कॉमिटिया ट्रेंडा – आदिवासी विधानसभाओं को सभी नागरिकों के लिए खोला गया; निर्वाचित आम अधिकारी; स्थानीय मामलों पर अक्सर अनुमोदित विधायी निर्णय; न्यायिक शक्तियों को मिटा सकता है लेकिन मृत्युदंड के बजाय केवल जुर्माना लगा सकता है।

गणतंत्र का नेतृत्व करने वाले दो विपक्ष थे जो विधान सभाओं द्वारा चुने जाते थे। उन्होंने एक वर्ष तक सेवा करने की, रोमन सीनेट की अध्यक्षता की और रोमन सेना की कमान सँभालने का प्रभार मिलता था। यद्यपि उनकी शक्ति कुछ हद तक अन्य मजिस्ट्रेट पदों की स्थापना के द्वारा सीमित थी, फिर भी प्रभावी रूप से राज्य के प्रमुख थे।

गणतंत्र कई शताब्दियों तक मजबूत रहा। हालाँकि, जैसे ही रोम की शक्ति और क्षेत्र का विस्तार हुआ, आंतरिक संघर्ष उभरने लगे क्योंकि नागरिक और परिवार सत्ता के लिए संघर्षरत थे। उदाहरण के लिए, पहली शताब्दी में ई.पू. प्रसिद्ध रोमन संचालक मार्कस सिसेरो ने रोमन सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए एक रोमन सीनेटर लुसियस कैटलिन द्वारा एक साजिश का खुलासा किया। कुछ नागरिकों, जैसे कि ग्रेचस बंधुओं, ने गरीबों की मदद करने के लिए सरकारी सुधारों और सामाजिक सुधारों को स्थापित करने का प्रयास किया। अंततः, गुट उभरे (या तो पेट्रिशियन या प्लेबीयन वर्गों के लिए या एक विशिष्ट सैन्य जनरल के प्रति वफादार), शत्रुताएँ भड़क उठी और गृह युद्धों की एक श्रृंखला ने गणतंत्र को त्रस्त कर दिया। इन गृह युद्धों के दौरान, एक सैन्य प्रमुख जूलियस सीज़र नाम के राजनेता महत्वपूर्ण शक्ति प्राप्त करने लगे। उसने अपनी सेना में सैनिकों की वफादारी की कमान संभाली और गॉल प्रांत पर विजय प्राप्त करने के बाद पर्याप्त संपत्ति हासिल की।

गॉल प्रान्त मौजूदा फ्रांस, बेल्जियम, नेदरलैंड्स, स्विट्ज़रलैंड और जर्मनी में असंगठित आदिवासयो का समुदाय था जहाँ सीज़र से पहले किसी भी शासक ने जितने का साहस नहीं दिखाया था| गॉल प्रांत में मिली जीत के परिणामस्वरूप सीज़र का कद रोम में काफी ऊँचा लगने लगा|

सीज़र की शक्ति से भयभीत सीनेट ने सीज़र को अपनी सेना की कमान छोड़ने और एक नागरिक के रूप में रोम लौटने की मांग की। बजाय कमान छोड़ने और आत्मसमर्पण करने के सीज़र ने अपनी सेना को सीधे रोम में प्रवेश कराया। परिणामस्वरूप, सीज़र और उसके मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी, पोम्पी के बीच एक और गृह युद्ध छिड़ गया। सीज़र विजयी हुआ, और उसने पहले पहले 10 साल के लिए खुद को तानाशाह नामित किया जिसे सीनेट ने एकमत मंजूरी दी| उन दिनों गणराज्य में किसी को आपातकाल में तानाशाह नामित करने का प्रावधान था जिससे राज्य के हित में तानाशाह बिना किसी रोक टोक महत्वपूर्ण निर्णय ले सके| हालांकि 10 साल होने से पूर्व सत्ता के मोह से ग्रस्त सीज़र ने खुद को आजीवन तानाशाह नामित किया गया।

जूलियस सीज़र की मृत्यु का चित्रण विन्सेन्ज़ो कैमुचिनी द्वारा। लेमेज / गेटी इमेजेज

गणतंत्र के भीतर अन्य नेताओं को डर था कि सीज़र इस नए शीर्षक के साथ अत्याचारी बन जाएगा और गणराज्य और सामन्य वर्ग का अधिकार खतरे में पद जायगा। इसे रोकने के लिए, सीनेटरों के एक समूह जिसका नेतृत्व ब्रूटस कर रहा था, ने साजिश रची और सीज़र हत्या कर दी। ये इतिहास की एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है| विलियम शेक्सपीयर का बहुचर्चि नाटक जूलियस सीज़र इसी हत्या पे आधारित है|

हालांकि गणराज्य के मूल सिधान्तो को बचाने की ये कोशिस नाकाम साबित हुयी जहाँ एक सीज़र के मौत के परिणामस्वरूप उभर कर आए खाली स्थान को भरने की होड़ लग गयी सैन्य अधिकारीयों और सीनेट में, परिणामस्वरूप रोम एक विशाल गृह युद्ध की ओर मुड गया| ये गृह युद्ध की स्थितियां काफी हद तक आज के इराक के तानाशाह सद्दाम से मिलती है जहाँ उसे गद्दी से हटाने के बाद उसके स्थान को भरने के लिए बहुआयामी शक्तियों ने भरपूर प्रयास किया नतीजतन दो दशक बाद भी आराजकता की स्थिति बनी है| बहरहाल हम वापस आते है सीज़र की मृत्यु पर जिसके जवाब में, उनके भतीजे और वारिस ऑगस्टस ने षड्यंत्रकारियों को हराया। उन्होंने तब खुद को पहले रोमन सम्राट के रूप में स्थापित किया। हालाँकि गणराज्य और नागरिको के मन को टटोलते हुए और विद्रोह की आकांशा से उसने अपने आप को राजशाही खिताबों से दूर रखा, और इसके बजाय खुद को प्रिंसप्स सिविटिस (“राज्य का पहला नागरिक”) कहा। ये लगभग पांच शताब्दियों तक चलने वाले गौरवशाली गणराज्य का अंत था|

रोमन साम्राज्य ने नाटकीय रूप से सत्ता को प्रतिनिधि लोकतंत्र से केंद्रीकृत शाही प्राधिकरण में स्थानांतरित कर दिया, जिसमें सम्राट सबसे अधिक शक्ति रखते थे। उदाहरण के लिए, ऑगस्टस के शासनकाल के दौरान, सम्राटों ने कानूनों को पेश करने और वीटो करने की क्षमता प्राप्त की, साथ ही साथ सेना की कमान भी संभाली। इसके अलावा, सम्राट ने निचले स्तर के कार्यकारी पदों पर कार्य करने वालों पर महत्वपूर्ण अधिकारो को छेड़ा। कोई भी नागरिक सम्राट की सहमति के बिना कार्यालय में पद धारण नहीं कर सकता था। सत्ता के इस पुनर्वितरण के परिणामस्वरूप, गणतंत्र काल के दौरान काम करने वाली लोकप्रिय विधानसभाएं कम महत्वपूर्ण और शक्तिशाली बन गईं।

 
जबकि विधानसभा वस्तुतः औपचारिक बन गई, सीनेट बच गया। मुख्य रूप से, सीनेट साम्राज्य के प्रारंभिक काल में एक सम्राट के शासन के वैध के रूप में जीवित रहा। सम्राट को दी गई शक्तियां अभी भी सीनेट से आई थीं। चूंकि सीनेट रोम के कुलीन और बौद्धिक नागरिकों से बना था, इसलिए उन्होंने जनमत को प्रभावित किया। इस शक्ति के साथ, सीनेट एक सम्राट को राज्य का दुश्मन घोषित कर सकती थी, देशद्रोही बता सकती थी, या एक सम्राट का अनुसरण कर सकती थी|

ऑगस्टस के शासनकाल के समय, रोमन गणराज्य ने इतालवी प्रायद्वीप पर नियंत्रण को स्थिर कर दिया था, पोनिक युद्धों के दौरान कार्थेज पर अपनी जीत के बाद उत्तर अफ्रीकी उपनिवेशों की स्थापना की, और स्पेन और गॉल में बड़े क्षेत्रों का नियंत्रण किया। इंपीरियल रोमन सम्राटों के तहत, रोमन क्षेत्र का विस्तार हुआ, जिसमें अधिकांश यूरोपीय महाद्वीप शामिल थे, जिनमें ब्रिटेन और आधुनिक पूर्वी यूरोप के प्रमुख क्षेत्र शामिल थे।

रोम के महान धन, शक्ति और प्रतिष्ठा के लिए लाते हुए इस विस्तार ने अंततः इसके पतन को लाने में मदद की। यहां तक ​​कि सैन्य और व्यापार की गतिशीलता में योगदान देने वाली रोमन सड़क प्रणाली के साथ, विशाल साम्राज्य को बनाए रखने की लागत रोम के खजाने और इसके राजनीतिक प्रशासन दोनों पर भारी पड़ती थी। इस बोझ के साथ विदेशी जनजातियों और समुदायों द्वारा छापे और हमले बढ़ रहे थे। आंतरिक सुधारों के माध्यम से सम्राटों ने इन समस्याओं को हल करने का प्रयास किया।

उदाहरण के लिए, सम्राट डायोक्लेटियन ने रोमन साम्राज्य के नियंत्रण को दो हिस्सों में विभाजित किया, एक पश्चिमी और एक पूर्वी भाग। डायोक्लेटियन का मानना ​​था कि पूरे साम्राज्य के क्षेत्रों को नियंत्रित करना और समर्थन करना आसान होगा यदि वे दो प्रशासन द्वारा देखरेख करते हैं। भविष्य के सम्राटों ने इसी तरह के सुधारों का प्रयास किया, लेकिन अंततः पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच आंतरिक संघर्ष, विदेशी जनजातियों द्वारा बाहरी दबाव, और रोम के धन और बुनियादी ढांचे की निरंतर कमी ने अंततः साम्राज्य के पतन के लिए संवेदनशील बना दिया।

476 ई. में, पश्चिमी रोमन सम्राटों के अंतिम, रोमुलस ऑगस्टुलस को राज गद्दी से हटा दिया गया था। फिर भी, रोमन साम्राज्य के पूर्वी आधे हिस्से को बीजान्टिन साम्राज्य के रूप में इतिहास में पहचाना जाता है|

ये लेख द कूटनीति हिंदी टीम ने लिखा है| ये लेख अल्फ्रेड ब्राउन से हुए साक्षात्कार का सारांश है| प्रोफेसर विएना में यूरोपियन स्टडीज़ के प्रोफेसर है|

इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार और राय लेखकों के हैं और जरूरी नहीं कि द कूटनीति टीम के विचारों को प्रतिबिंबित करें

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